जुर्म की इबारत लिख करोड़पति बन गया था ये शख्स

Daily Hunt News 4/14/2019 4:01:50 PM

छपरा। कभी सेना की वर्दी पहन कर देश की हिफाजत की कसम लेने वाला भगोड़ा सैनिक शंकर दयाल सिंह उर्फ फौजी जुर्म की इबारत लिख कर करोड़पति बन गया था। शंकर की रविवार को रिविलगंज थाना क्षेत्र के दारोगा राय के डेरा दियारा में गर्दन काटकर हत्या कर दी गई। भोजपुर जिले के बड़हारा निवासी फौजी के पास 200 बीघा जमीन बताई जाती है। 

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करीब आठ वर्षों तक चली वर्चस्व की जंग में विरोधियों का खात्मा करके फौजी गिरोह ने वर्ष 2012 में मनेर के दियारा में अपने आतंक की सल्तनत खड़ी कर दी थी। इसमें मनेर के दुर्दांत नृपेंद्र राय उर्फ उपेंद्र ने भी अहम भूमिका निभाई। दरअसल दियारा के विभिन्न इलाकों में अलग-अलग गिरोहों की समानांतर हुकूमत है। मनेर दियारा पर दबदबे को लेकर वर्ष 2005 के बाद खूनी होड़ तेज हो गई। आरंभिक भिड़ंत में नृपेंद्र का एक भाई भी मारा गया था। दियारा के आसपास के इलाकों के लोग फौजी और सिपाही नाम से मशहूर 2 गिरोहों का साथ देते थे। 

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मनेर के दियारा इलाके की एक बड़ी खासियत यह है कि वहां के तकरीबन हर घर में एक फौजी है और फौज में रहने के दौरान उनकी पोस्टिंग जब जम्मू व कश्मीर में होती है, तो वे वहां अपने नाम से राइफल या बंदूक का लाइसेंस जारी करा लेते हैं और दियारा इलाके में बालू के गैरकानूनी खनन में लगे अपराधी गिरोहों को ढाई तीन हजार रुपए के मासिक किराए पर दे देते हैं। बालू निकालने के लिए जिन जेसीबी और पोकलेन मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है, वे लोकल बाहुबलियों की होती हैं । 

एक मशीन की कीमत 40 लाख से 50 लाख रुपए होती है और उसे खरीदना आम आदमी के बूते की बात नहीं है। सोन नदी से गैरकानूनी रूप से बालू निकालने और उससे करोड़ों रुपए की कमाई करने वाले शंकर और उमाशंकर सिंह उर्फ सिपाही को पटना, भोजपुर और सारण जिलों की पुलिस पिछले कई सालों से ढूंढ़ रही थी, पर उन पर हाथ नहीं डाल सकी। 

मूल रूप से कैमूर जिले के रहने वाले फौजी पर दर्जनों हत्याओं और पुलिस पर गोलियां चलाने का आरोप है। सिपाही गिरोह का सरगना मनेर थाने की सूअरमरवा भरवा पंचायत का मुखिया है। इन दोनों के बीच बालू घाट पर कब्जा जमाने को ले कर अकसर खूनी भिड़ंत होती रहती है। 30 और 31 जुलाई, 2016 को इन दोनों गुटों के बीच अंधाधुंध फायरिंग से सोन का दियारा का इलाका थर्रा उठा था । 

फायरिंग में कोइलवर के प्रमोद पांडेय की मौत हो गई थी और दोनों ओर के दर्जनों लोग घायल हो गए थे। प्रमोद फौजी गिरोह का सदस्य था। 30 मार्च, 2014 को पुलिस ने फौजी को उसके 9 गुरगों के साथ पकड़ा था। उस के पास से बड़े पैमाने पर देशी और विदेशी हथियारों का जखीरा बरामद किया गया था, लेकिन जेल से छूटने के बाद वह फिर से बालू खनन के गैरकानूनी काम में लग गया । 

दियारा के जिस इलाके को ले कर खूनी जंग छिड़ी हुई है, उस जमीन के बारे में सरकार और प्रशासन के बीच ही विवाद का माहौल बना हुआ है। 2 अगस्त, 2016 को पटना और भोजुपर जिले के एसपी और 3 अंचल के सी आई की बैठक में जमीन को ले कर बातचीत हुई। पटना और भोजपुर को जोड़ने वाले महुई हाल का इलाका साल 1920 के सर्वे के हिसाब से पटना को मिल गया था। 1972 में हुए सर्वे के मुताबिक उसे भोजपुर का हिस्सा करार दिया गया, लेकिन आज तक उसे मंजूरी नहीं मिल सकी। 

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इस लिहाज से उसे पटना का ही इलाका बताया जा रहा है। बिहटा और आनंदपुर गांव के किसान भी इस सरकारी हेरफेर से उलझन में हैं। किसानों की जमीन की रसीद पटना जिले से ही कट रही है। फौजी ने इन्हीं किसानों से बालू निकालने का एग्रीमैंट कर रखा है। सिपाही गुट जब तब इस एग्रीमैंट का विरोध कर अपना कब्जा जमाना चाहता है, जिस से गोलीबारी होती थी। सिपाही गिरोह का कहना है कि यह जमीन सरकार की है। 

बालू वाली जमीन ठेके पर लेने के बाद सरगना वहां से बालू निकालने के लिए पोकलेन मशीन और नावों का इंतजाम कराता है। गौरतलब है कि सड़क रास्ते से बालू ढोने वाली गाडि़यों का चालान काटा जाता है, परंतु नदी के रास्ते से जाने वाली नावें बंदूक के जोर पर ही चलती हैं। महुई महाल से बालू निकाल कर माफिया वाले उसे नाव के जरिए छपरा ले आते हैं और बेच देते हैं। 

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दियारा इलाके के काफी दूर होने की वजह से अपराधी गिरोह जम कर चांदी काटते हैं। वहां पुलिस और प्रशासन के अफसरों का पहुंचना काफी मुश्किल है। इसका फायदा उठाते हुए फौजी और सिपाही गिरोह ने अपनी अपनी चेक पोस्ट भी बना रखी है और उस रास्ते से गुजरने वाली नावों से टैक्स वसूलते हैं।

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